शनिवार, 17 मार्च 2012

सिंगरौली - पूँजीवाद का आतंक




दुनिया के सबसे बडे़ लोकतंत्र होने का दावा करने वाले देश भारत में साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद के रूप में पूँजीवाद का आतंक कितना भयावह है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश का सीमावर्ती क्षेत्र-सिंगरौली। एक समय अपनी उपजाऊ भूमि तथा घने जंगलों के लिए प्रसिद्ध रहा यह क्षेत्र या तो रिहंद डैम की वजह से डूब में आ चुका है, या फिर देश के विभिन्न बिजली परियोजनाओं का और इनमें ईधन के बतौर कोयले की सुगम उपलब्द्धता का जरिया बन चुका है। सिंगरौली का ‘महान‘ जंगल, जिसे महज 2-3 दशकों पहले के लोक गीतों में एक ऐसे सघन जंगल के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है जहाँ से पुरुषों के लौटने पर उनके घरों की महिलाएँ अपने भाग्यशाली होने का उत्सव मनाती हैं, आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। छत्तीसगढ़, झारखण्ड, आंध्र प्रदेश आदि राज्यों में एक समान रूप से फैलता बड़ी पूँजी का यह आतंक ‘जनता के लिए, जनता के द्वारा, जनता की सरकार‘ के जुमले को पूर्णतया खारिज करता है।
सोन, रिहंद, कन्हर आदि नदियों के घाटी में पली-बढ़ी इस क्षेत्र की मिट्टी और संस्कृति, दोनों ही काफी समृद्ध रही हैं। स्थानीय जनजातीय जीवनशैली सदा से ही मानव जीवन और प्रकृति के तालमेल का प्रतिनिधित्व करती रही है, जिसमें दोनों के बीच अन्योन्याश्रय का सम्बन्ध रहा है। जंगलों में पैदा होने वाले विभिन्न उत्पाद न केवल वनवासियों का पेट भरते रहे हैं, बल्कि अन्य जरूरतों की पूर्ति हेतु उनके धनार्जन का भी स्रोत रहे हैं। विकास के वर्तमान मॉडल के परिणाम के बतौर यह अन्योन्याश्रयी सम्बन्ध अधिकाँश क्षेत्रों में टूट चुका है, अथवा टूटने के कगार पर है। पिछली सदी के अंतिम दशक में शुरू हुई वोट की राजनीति के तहत जिस ‘विकास‘ का वादा किया गया था, उसके फलस्वरूप, इन ‘विकासवादी‘ नीतियों के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी जनता के द्वारा चुनी गई सरकारों ने पुलिस के डंडे पर डाल दिया है। देश भर में चल रही ये ‘विकासवादी‘ परियोजनाएँ अपने मूल में, संसाधनों के गहराते वैश्विक संकट के दौर में, नए क्षेत्रों में पूँजीवादी ताकतों के द्वारा संसाधनों की लूट का जरिया हैं। इनके खिलाफ उठने वाली आवाज को ‘कानून-व्यवस्था‘ में खलल पैदा करने की कोशिश माना जाता है। पुलिस, और कहीं-कहीं सेना की भी, सरपरस्ती में चलाई जा रही यह परियोजनाएँ देश- विदेश के प्रभावशाली वर्गों को और ज्यादा अमीर बना रही हैं, जबकि इसका सबसे बड़ा खामियाजा उस वर्ग को झेलना पड़ रहा है जो सदा से स्वयं में ही संपन्न और संतुष्ट रहा है और जिसका इस कथित लोकतंत्र के दमनकारी ‘विकासपरक‘ राजनीति में कोई दखल नहीं रहा है। विकास के इस वर्तमान मॉडल ने इस वर्ग को अपनी जमीन, व्यवसाय, संस्कृति और खुशहाली से विस्थापन के सिवाय और कुछ भी नहीं दिया है।
विकास के इसी मॉडल को अपनाते हुए सिंगरौली क्षेत्र में जमीन और जंगल की जबरदस्त लूट मची है। स्थानीय मिट्टी की सम्पन्नता बड़ी देशी- विदेशी कंपनियों के लिए लालच का केंद्र बनी हुई है। 1979 में एन0टी0पी0सी0 परियोजना की शुरुआत के तत्काल बाद से इस क्षेत्र में सभी बड़े औद्योगिक घरानों का हस्तक्षेप बढ़ता ही चला गया। हजारों लाखों सालों से वनों से आच्छादित इस पूरे इलाके में तमाम सरकारी गैर सरकारी सर्वेक्षणों के पश्चात जैसे-जैसे बहुमूल्य खनिज, यथा कोयला, बाक्साइट, लोहा, ताँबा, सोना, मीथेन आदि मिलते चले गए, वैसे-वैसे वनों के साथ-साथ वनवासी समाज, ‘तीसरी दुनिया‘ के तमाम संसाधन संपन्न क्षेत्रों की तरह यहाँ भी, विकास के मॉडल में एक अवरोध के बतौर देखा जाने लगा। तीन दशक पहले एन0टी0पी0सी0 परियोजना के प्रथम प्लांट के कारण जिन परिवारों का विस्थापन हुआ था, उनके साथ कई लोकलुभावन वादे किए गए थे। परिवार के एक सदस्य को नौकरी, रहने के लिए जमीन, घर बनाने के लिए जरुरी आर्थिक मदद एवं रिहाइश की नई जगह के करीब स्कूल तथा अन्य जरुरी सुविधाएँ जैसे अस्पताल, बच्चों के लिए खेल के मैदान आदि तमाम आश्वासन का सपना दिखा कर सीधे-सादे आदिवासियों से इनकी जमीनें ले ली गईं। पहले प्लांट के स्थापना के तीन दशक बाद आज भी कई परिवार ऐसे हैं जो पुनर्वास की राह देख रहे हैं। इन तीन दषकों के दौरान सरकारी और निजी कंपनियों की लाइन लग गईं और आज सिंगरौली क्षेत्र में रिलायंस और एस्सार समूह जैसी कम से कम 50 कम्पनियाँ काम कर रही हैं। इन सभी की उपस्थिति और कामकाज के जारी रहने का एकमात्र अर्थ है- निरंतर विस्थापन। ऊर्जा राजधानी के नाम से मषहूर किए गए सिंगरौली में आज सबसे बड़ा मुद्दा विस्थापन ही है। बमुश्किल 2 पीढि़यों पहले तक इस क्षेत्र के निवासियों के लिए उनकी कृषि योग्य छोटी सी जमीन ही सब कुछ हुआ करती थी। जंगल में रहने वाले जनजातीय समुदाय के लिए जंगल में उत्पन्न होने वाले प्राकृतिक उत्पाद ही सुख चैन और संतुष्टि से भरी जिन्दगी के संसाधन थे। लेकिन आज परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं। चिल्का डांड पंचायत के राजेश, सरकार और कंपनियों के द्वारा किए गए धोखे के बारे में बताते हैं- ‘हमें दो बार विस्थापित किया जा चुका है। सबसे पहले हम जहाँ थे वहाँ सर्वप्रथम एन0टी0पी0सी0 को कोयला मिला। उस जगह से हटा कर हमें काफी दूर बसा दिया गया। नौकरियों और अन्य तमाम वायदे किए गए और इंतजार करने को कहा गया। इसके पहले कि वायदे पूरे किए जाते, दूसरी कंपनी एन0सी0एल0 ने हमें वहाँ से भी, कोयला होने की बात कह कर, विस्थापित कर दिया। आज 15 वर्षों से हम यहाँ हैं। इन्होंने सुविधाएँ तो दूर, हमारी जिन्दगी नरक बना दी है।‘ तीन तरफ से खान और एक तरफ खान से कोयला ले जाने के लिए बिछाई गई रेल लाइन से घिरे चिल्का डांड पर एक बार फिर विस्थापन का संकट मंडरा रहा है। अब की बार गाँव वाले इकट्ठा हैं और अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने हटने से मना कर दिया है, लेकिन कंपनी ने कोयला खनन का काम भी शुरू कर दिया है। गाँव से बमुश्किल 50 मीटर की दूरी पर ब्लास्टिंग की जाती है, जिससे बडे़ बडे़ पत्त्थर और कोयले का टुकड़ा आबादी वाले क्षेत्रों में रोजाना गिरता है। दोपहर 1 बजे से 4 बजे तक वे घर के अन्दर रह कर अपनी जान तो अब तक बचाए हुए हैं, पर इतने नजदीक बडे़-बडे़ बमों से ब्लास्टिंग के कारण घरों की दीवारों में पहले ही दरारें पड़ चुकी हैं। देखना यह है, कि ब्लास्टिंग के दौरान रोजाना छिपने के लिए कब तक उनके घर बचे रहते हैं। चिल्का डांड इस किस्म का अकेला गाँव नहीं है, जो बार-बार परेशानियां झेल रहा है। कुछ ही दूरी पर बसा पेडर्वा गाँव भी इसी श्रृंखला का दूसरा नाम है, जिसे पहले ही दो बार विस्थापित किया जा चुका है।
-रवि शेखर
क्रमश:

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