बुधवार, 26 जुलाई 2017

अडानी, अम्बानी की नौकरी छोडो’

बाराबंकी। योगी मोदी की सरकार नही चलेगी, नही चलेगी, किसान कर्जो की माफी, किसानो का नरसंहार बन्द करो। अडानी, अम्बानी की नौकरी छोडो’, जेल में तेरी जगह है कितनी, देखा है और देखेगें, हर जोर जुल्म के टक्कर पर संघर्ष हमारा नारा है, आदि गगनभेदी नारो के साथ देवा रोड़ स्थित गांधी भवन से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का जेल भरो जुलूस शुरु होकर पटेल तिराहे होते हुये जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचा। जंहा पर कार्यकर्ताओ ने जमकर नारेबाजी करते हुये अपनी गिरफ्तारी देनी चाही। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा पूरे देशभर में किसानो की समस्याओ को लेकर जेल भरो आन्दोलन किया जा रहा है। देश-प्रदेश की सत्तारुढ़ दल की किसान विरोधी नीतियो के कारण प्रतिदिन किसान आत्म-हत्यांए कर रहा है। किसानो ने आन्दोलन के दौरान यह मांग कि किसानो को उनकी फसलो की सरकारी लागत मूल्य के हिसाब से लाभकारी मूल्य निर्धारित किया जाये। जेल भरो आन्दोलन जुलूस में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी समेत अखिल भारतीय नौजवान सभा व किसान सभा कार्यकर्ताओ ने हिस्सा लिया। आन्दोलन के दौरान बृजमोहन वर्मा, रणधीर सिह सुमन, जिलाध्यक्ष नौजवान सभा सरदार भूपिन्दर पाल सिंह, पंड़ित प्रत्यूशकान्त शुक्ला, डा0 कौशर हुसैन, अनिल बौझड़, मंयकर यादव, रामतेज यादव, गिरीश चन्द्र, रामनरेश वर्मा, सन्तराम प्रधान, विनय कुमार सिंह, अमर सिंह, दलसिंगार, विनोद यादव, मुनेश्वर बक्श वर्मा, शिवदर्शन वर्मा, शम्भू वर्मा, जितेन्द्र वर्मा, सुभाष वर्मा, शाहिद अली, रमेश चन्द्र, राजेन्द्र बहादुर सिंह राणा, कर्मवीर िंसह, सुरेश यादव, आशूतोष वर्मा, लवकुश, धीरेन्दर, अम्बिका, अमर सिंह गुड्डू, प्रदीप यादव, कपिल वर्मा, सलाम मोहम्मद आदि प्रमुख लोग शामिल रहे। उपजिलाधिकारी एस0पी0सिंह व क्षेत्राधिकारी नगर श्वेता श्रीवास्तव ने धारा 144 का उल्लंघन न होने पर गिरफ्तारी से मना कर दिया।

शनिवार, 22 जुलाई 2017

चीनी निवेश और राष्ट्रवाद



देश-प्रेम और राष्ट्र-भक्ति हर किसी को होता है। किसे अपना घर, परिवार, जिला, राज्य और देश नहीं प्यारा होता है। सब को प्यारा होता है। हिंदी की एक कहावत है, "नैहर का कुत्ता भी प्यारा लगता है।" हमें भी अपने देश से प्यार है। हम भी देश की आन-बान-शान पर कुर्बान हैं। लेकिन, एक बात समझ में नहीं आता है कि जब हम कोई फुलझड़ी खरीदकर लाते हैं तो लोग चिल्लाने लगते हैं कि साहब आप तो विदेशी सामान ख़रीद कर ले जा रहे हैं। यह देशद्रोह है, यह राष्ट्रद्रोह है। ऐसे लोग उन विक्रेताओं पर सवालिया क्यों नहीं होते हैं कि जनाब यह सामान मुल्क का नहीं है। इसे बेंचना अपराध है, देशद्रोह है, राष्ट्रदोह है। और असली बात यह कि विक्रेता चीनी सामान लाते क्यों है, किसकी इजाजत से लाते हैं और कैसे लाते हैं? जब परमीशन नहीं है तो ऐसे लोगों को जेल क्यों  नहीं होती है? कौन उन्हें सहायता पहुंचाता है? देशप्रेमियों-राष्ट्रवादियों को सरकार से प्रश्न करना सीखना होगा कि हमारे देश में पूँजीपतियों को चीनी सामान क्रय करने की छूट क्यों देती है?
रवीश कुमार के एक लेख का सहारा लूँ तो 2011 में भारत में विदेशी निवेश करने वाले मुल्कों में चीन का स्थान 35 वां था। 2014 में 28 वां हो गया। 2016 मे चीन भारत में निवेश करने वाला 17 वां बड़ा देश है। विदेश निवेश की रैकिंग में चीन ऊपर आता जा रहा है। बहुत जल्दी चीन भारत में विदेश निवेश करने वाले चोटी के 10 देशों में शामिल हो जाएगा। भारत के लिए राशि बड़ी है मगर चीन अपने विदेश निवेश का मात्र 0.5 प्रतिशत ही भारत में निवेश करता है। (सन्दर्भ:10 अप्रैल, 2017, हिन्दुस्तान टाइम्स ने रेशमा पाटिल इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट से)
2011 में चीन ने कुल निवेश 102 मिलियन डॉलर का किया था, 2016 में एक बिलियन का निवेश किया, जो कि एक रिकार्ड है। जबकि इंडस्ट्री के लोग मानते हैं कि 2 बिलियन डॉलर का निवेश किया होगा चीन ने। एक अन्य आंकड़े के अनुसार चीन और चीन की कंपनियों का निवेश 4 बिलियन डॉलर है। (सन्दर्भ:10 अप्रैल,2017, हिंदुस्तान टाइम्स)
कई चीनी कंपिनयों के रीजनल आफिस अहमदाबाद में है। अब महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और हरियाणा की तरफ़ जाने लगे हैं। फरवरी 2017 के चीनी मीडिया रिपोर्ट के अनुसार चीन की सात बड़ी फोन निर्माता कंपनियां भारत में फैक्ट्री लगाने जा रही हैं। चीन की एक कंपनी है चाइना रेलवे रोलिंग स्टॉक, इसे नागपुर मेंट्रो के लिए 851 करोड़ का ठेका मिला है। चीनी मेट्रो के बहिष्कार को सफ़ल बनाने के लिए नागपुर से अच्छी जगह क्या हो सकती है! ( सन्दर्भ:15 अक्तूबर 2016 के बिजनेस स्टैंडर्ड )
चाइना रोलिंग स्टॉक कंपनी को गांधीनगर-अहमदाबाद लिंक मेट्रो में ठेका नहीं मिला तो इस कंपनी ने मुकदमा कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से अब इस कंपनी को 10,733 करोड़ का ठेका मिल गया है। यह ठेका इसलिए रद्द किया गया था कि चाइना रोलिंग स्टाक चीन की दो सरकारी कंपनियों के विलय से बनी है। विशेषज्ञों ने कहा है कि जब हम इतनी आसानी से चीन को निर्यात नहीं कर सकते तो उनकी कंपनियों को क्यों इतना खुलकर बुला रहे हैं। (सन्दर्भ:4 जुलाई 2017 के बिजनेस स्टैंडर्ड)
औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग (डीआईपीपी) के अनुमान के अनुसार, अप्रैल 2000 और दिसंबर 2016 के बीच चीन से कुल 1.6 अरब डॉलर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया था। लेकिन भारतीय बाजार विश्लेषकों और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार यह आंकड़ा दो अरब डॉलर से भी अधिक है।
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार सवंर्धन संबंधित चीनी परिषद को कानूनी सेवाएं प्रदान करने वाले गुड़गांव के ‘लिंक लीगल इंडिया लॉ सर्विस’ के साझेदार संतोष पई ने कहा, “भारत में वास्तविक चीनी निवेश आधिकारिक भारतीय आंकड़े से तीन गुणा अधिक है।” पई ने कहा कि भारतीय आंकड़े चीन के प्रत्यक्ष निवेश पर आधारित होते हैं, लेकिन चीन का अधिकांश प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हांगकांग जैसे कर पनाहगाह देशों के रास्ते होता है। पिछले साल चीन के उप वित्तमंत्री शी याओबिन ने कहा था कि चीन ने भारत में कुल 4.07 अरब डॉलर का और भारत ने चीन में 65 करोड़ डॉलर का निवेश किया है। पई ने कहा, “चीन शीघ्र ही भारत के सर्वोच्च 10 निवेशकों में से एक होगा।” हालांकि छह साल पहले स्थिति अलग थी, जब देश की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था से भारत में निवेश करने वाले कम ही थे। आज भारत की सबसे बड़ी डिजिटल भुगतान कंपनी पेटीएम की 40 प्रतिशत हिस्सेदारी चीन की ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा और उसके सहयोगियों के पास है।
गुजरात सरकार ने चीनी कंपनियों से निवेश के लिए 5 बिलियन डॉलर का क़रार किया है। (सन्दर्भ:22 अक्तजुवर 2016-इंडियन एक्सप्रेस)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महती परियोजना 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' का निर्माण का ठेका गुजरात सरकार द्वारा अग्रणी इंजीनियरिंग कंपनी लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी), चाइना को दिया गया है। 'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' भारत के पहले गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा होगी। सरदार पटेल की 182 मीटर ऊंची प्रतिमा का निर्माण 3000 करोड़ रुपये की लागत से पूरा किया जाएगा। अहमदाबाद में क्या इसका कोई विरोध हुआ, क्या होगा? कभी नहीं।
चीन भारत की बड़ी आईटी कंपनियों की जासूसी कर रहा है। भारत की एक बड़ी कंपनी को 8 मिलियन डॉलर की चपत लग गई क्योंकि जिस कंपनी के बिजनेस डेलिगेशन को भारत आना था, वो चीन चली गई। जब भारतीय कंपनी ने इसका पता किया तो यह बात सामने आई कि चीन की जासूसी के कारण उसके हाथ से ये ठेका चला गया। चीनी हैकरों ने भारतीय कंपनी के सारे डिटेल निकाल लिये थे। उस समय अखबार ने लिखा था कि खुफिया विभाग मामले की पड़ताल कर रहा है? (सन्दर्भ:15 दिसंबर 2008-डीएनए, बंगलुरु, जोसी जोज़फ़ की रिपोर्ट)
कर्नाटक सरकार चीनी कंपनियों के लिए 100 एकड़ ज़मीन देने के लिए सहमत हो गई है। (सन्दर्भ:8 जुलाई 2015-द हिन्दू)।
महाराष्ट्र इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कारपोरेशन ने चीन की दो मैन्यूफक्चरिंग कंपनी को 75 एकड़ ज़मीन देने का फ़ैसला किया है। ये कंपनियां 450 करोड़ का निवेश लेकर आएंगी। (सन्दर्भ:5 जनवरी 2016-इन्डियन एक्सप्रेस)
हरियाणा सरकार ने चीनी कंपिनयों के साथ 8 सहमति पत्र पर दस्तख़त किये हैं। ये कंपनियां 10 बिलियन का इंडस्ट्रियल पार्क बनाएंगी, स्मार्ट सिटी बनाएंगी। (सन्दर्भ:22 जनवरी 2016-ट्रिब्यून)
पिछले साल भारत में चीन के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में काफी वृद्धि नजर आई, लेकिन पिछले साल विश्व के 164 देशों में चीन के 10 खरब युआन या 170 अरब डॉलर के विदेशी निवेश को देखते हुए यह आंकड़ा नगण्य है। अकेले अमेरिका में चीन ने 45.6 अरब डॉलर निवेश किए थे। हालांकि पिछले दो सालों में भारत और चीन के बीच नए राजनीतिक मतभेद उभरने के बावजूद भारत में चीन का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बढ़ा है।
महाराष्ट्र के मुख्यमत्री देवेंद्र फड़णवीस की तरह हरियाणा के मुख्यमंत्री एम एल खट्टर भी चीन का दौरा कर चुके हैं. चीन का सबसे अमीर आदमी हरियाणा में साठ हज़ार करोड़ निवेश करेगा। (सन्दर्भ:24 जनवरी 2016-डीएनए)
चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा पिछले साल 46.56 अरब डॉलर पहुंच गया था। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार भी 2015 के 100 अरब डॉलर के लक्ष्य से नीचे रहा था। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 2014 में भारत में पांच साल में 20 अरब डॉलर के निवेश का वादा किया था। अगर यह वादा पूरा हो जाता है तो इससे भारत में चीन की आर्थिक उपस्थिति बढ़ जाएगी। लेकिन फिर भी यह शी के सबसे हालिया वादे का छोटा-सा हिस्सा ही होगा, जिसके अनुसार चीन पांच सालों में विदेश में 750 अरब डॉलर निवेश करेगा। समझ नहीं आता है कि एक समय इन्हीं कारोबारी रिश्तों को सरकार और अर्थव्यवस्था की कामयाबी के रूप में पेश किया जाता है और जब विवाद होता है कि इन तथ्यों की जगह लड़ियां-फुलझड़ियां का विरोध शुरू हो जाता है। क्या चीनी सामान का विरोध करने वाले भारत में चीन के निवेश का विरोध करके दिखा देंगे?
खबर है कि अलीबाबा पेटीएम में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर 62 प्रतिशत करने जा रहा है। इतना ही नहीं, चीन की चौथी सबसे बड़ी मोबाइल फोन कंपनी जियोमी भारत स्थित एक नए कारखाने में हर सेकंड में एक फोन असेंबल कर रही है।
डीआईपीपी के मुताबिक, फिर भी भारत में कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और चीन के वैश्विक विदेशी निवेश दोनों स्तरों पर चीन का भारत में निवेश तुलनात्मक रूप से कम है। विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद भारत में चीन का कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश केवल 0.5 प्रतिशत है। जापान की तुलना में (7.7 प्रतिशत) यह बेहद कम है।
देशभक्ति के सवाल पर आप चीन का विरोध कीजिए, उसमें कुछ ग़लत नहीं है लेकिन जो आपके घर में घुस गया है, उसका विरोध कीजिए। विरोध का लक्ष्य बड़ा होना चाहिए। हमें देश की आर्थिक नीतियों पर गौर करना सीखना होगा। हमें अपने नेताओं की कथनी-करनी के फर्क को समझना होगा। हमें नेताओं के भाषणों के निहितार्थ को समझना होगा कि इससे हमारे आर्थिक व सामाजिक जीवन पर क्या असर पड़ने वाला है।  मैं यह इसलिए लिख रहा हूँ कि ताकी आप सभी अपडेट हो सकें और समाज बहुत बड़ी हिंसक वृत्ति से बच सके। व्हाटसप और फेसबुक पर होने वाले गली-गलौज से भी आप बच सकें।
आर डी आनंद
20.07.2017

शनिवार, 1 जुलाई 2017

हिंदुस्तान किसानों का क़ब्रिस्तान क्यों बनता जा रहा है?

राज्य बनने के बाद तेलंगाना में 3000, मध्य प्रदेश में 21 दिन में 40, मराठवाड़ा में दो हफ़्ते में 42 और छत्तीसगढ़ में एक पखवाड़े में 12 किसानों ने आत्महत्या की है.

farmer
फोटो: पीटीआई
किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा बता पाना नामुमकिन है. हर रोज़ दर्जनों किसानों के आत्महत्या कर लेने की सूचनाएं आ रही हैं. हर दिन देश भर से इतनी सूचनाएं प्राप्त हो रही हैं कि यह किसी तबाही से कम नहीं है. इतनी आत्महत्या की सूचनाओं को लेखा-जोखा रख पाना नामुमकिन है.
पिछले कुछ दिनों में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, राजस्थान, पजांब और उत्तराखंड से दर्जनों किसानों के आत्महत्या करने की ख़बरें आई हैं. प्रदेश में जून महीने में ही आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 40 से ज़्यादा हो गई है. मीडिया रिपोर्ट्स के अलावा मध्य प्रदेश की विपक्षी पार्टी ने यह दावा किया है.
नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने दावा किया है कि जून महीने की शुरुआत से अब तक मध्य प्रदेश में 40 से ज़्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं. लेकिन राज्य सरकार किसानों के प्रति संवेदनहीन बनी हुई है.
राज्य के सीहोर, होशंगाबाद, रायसेन, धार, नीमच, छतरपुर, सागर, टीकमगढ़, रायसेन, बालाघाट, बडवानी, छिन्दवाडा, रतलाम, पन्ना, इंदौर, हरदा, देवास, खंडवा, शिवपुरी और विदिशा ज़िलों में किसानों की आत्महत्या की ख़बरें आईं. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के गृह ज़िले सीहोर में छह किसानों ने आत्महत्या की है.
मध्य प्रदेश में क़र्ज़ में डूबे किसानों के आत्महत्या करने का सिलसिला थम नहीं रहा है. कई राज्यों के किसानों ने एक जून से दस जून तक आंदोलन किया था. इस दौरान छह जून को मध्य प्रदेश के मंदसौर में गोलीबारी में छह किसानों की मौत की घटना के बाद एक पखवाड़े के भीतर 26 किसानों ने आत्महत्या कर ली थी.

हर दिन दो से पांच आत्महत्याएं

मध्य प्रदेश में 29 जून को सीहोर और होशंगाबाद ज़िलों में दो किसानों ने ख़ुदकुशी कर ली. सीहोर के ईंटाखेड़ा गांव के मारिया आदिवासी (52) ने अपने खेत में पेड़ से फांसी लगाकर जान दे दी.
होशंगाबाद ज़िले में पिपरिया के सांडिया में गुलाब सिंह ने आत्महत्या कर ली. परिजनों के मुताबिक, उनकी 8 एकड़ जमीन पर 2 लाख का क़र्ज़ था, जिसे लगातार फसल ख़राब होने के चलते वे चुका पाने में असमर्थ थे.
28 जून को धार ज़िले में एक किसान मदनलाल ने ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली. मदनलाल के पुत्र मनोज का दावा है कि क़र्ज़ के चलते वे दबाव में थे, क्योंकि बैंक का क़र्ज़ चुकाने की हालत में नहीं थे. धार ज़िले में 27 और 28 जून के बीच दो किसानों ने आत्महत्या की है.
26 और 27 जून के बीच मध्य प्रदेश में क़र्ज़, सूदखोरों की प्रताड़ना और अन्य कारणों से परेशान होकर पांच और किसानों के आत्महत्या की ख़बर है.
27 जून को भरवेली, बालाघाट के रहने वाले एक किसान डालचंद ने ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली. डालचंद पर बैंक और सोसाइटी का तीन लाख का क़र्ज़ था. डालचंद के परिजनों ने उनकी मौत के बाद उनका शव सड़क पर रखकर प्रदर्शन किया.
फोटो: पीटीआई
फोटो: पीटीआई
डालचंद के परिजनों के मुताबिक, उन्होंने क़र्ज़ चुकाने की गरज से अपनी डेढ़ एकड़ ज़मीन बेची भी थी, फिर भी क़र्ज़ नहीं चुका पाए. उनके पास बैंक से लगातार फोन आ रहा था, सोसायटी ने उन्हें डिफाल्टर घोषित कर दिया था. इससे परेशान होकर डालचंद ने ख़ुदकुशी कर ली.
समाचार एजेंसी भाषा के मुताबिक, इंदौर ज़िले में क़र्ज़ के बोझ तले दबे 21 वर्षीय किसान ने सोमवार की रात कथित तौर पर ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली.
गांधी नगर पुलिस थाना के प्रभारी आरएस शक्तावत ने बताया कि जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर धरनावदा गांव में पवन केवट ने 26 जून देर रात कथित तौर पर ज़हर खा लिया. उसे जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां जांच के बाद डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. उसकी तीन महीने पहले ही शादी हुई थी.
केवट या उसके पिता के नाम खेती की कोई ज़मीन नहीं है. हालांकि, उसने साल भर पहले एक व्यक्ति से बंटाई पर तीन बीघा ज़मीन लेकर इस पर खेती की थी. बंटाई का क़रार ख़त्म होने के बाद वह इन दिनों मज़दूरी कर रहा था.
पुलिस को शुरुआती जांच में पता चला कि केवट पर एक बैंक का कुछ क़र्ज़ था. पुलिस बैंक से इसकी जानकारी निकलवा रही है.
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य के खंडवा जिले में हरसूद निवासी घिसिया खान (70) ने ईद की रात खेत के कुएं में कूदकर जान दे दी. मंगलवार को घिसिया का शव बरामद हुआ. उन्होंने एक ट्रैक्टर ख़रीदा था, जिसके लिए क़र्ज़ लिया था और क़र्ज़ नहीं चुका पा रहे थे.
प्रदेश के झाबुआ ज़िले के पारा चौकी के आदिवासी किसान जहू ने 26 जून को कीटनाशक पीकर जान दे दी. पुलिस का कहना है कि जहू के बेटे ने एक लड़की के साथ भागकर शादी की थी. पंचायत ने जहू को आदेश दिया था कि वह लड़की वालों को साढ़े चार लाख रुपये दहेज में दे. ज़मीन गिरवी रखने के बाद भी क़र्ज़ नहीं उतरा तो उन्होंने आत्महत्या कर ली.
देवास ज़िले की टोंकखुर्द तहसील के केसली गांव के रहने वाले किसान मनोहर सिंह ने भी ज़हर पीकर जान दे दी. उन पर पांच लाख रुपये का क़र्ज़ था.
रविवार को बुंदेलखंड क्षेत्र के टीकमगढ़ ज़िले में एक 65 वर्षीय किसान बारेलाल अहिरवार ने अपने खेत में पेड़ से लटक कर जान दे दी. हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक, उनके बेटे चंद्रभान ने कहा कि उनके पिता ने स्थानीय सूदखोर से 45,000 का क़र्ज़ ले रखा था. लेकिन प्रशासन का कहना है कि अहिरवार मानसिक रूप से बीमार थे.
यह ध्यान रखने की बात है कि जितने किसानों ने आत्महत्या की है, हर मामले में मरने वाले किसानों के परिजन दावा कर रहे हैं कि उन्होंने क़र्ज़ के कारण ख़ुदकुशी की, जबकि लगभग हर मामले में प्रशासन का दावा इससे इतर है. प्रशासन लगातार यह मानने से इनकार करता रहा है कि किसान क़र्ज़ से ख़ुदकुशी कर रहे हैं.
पिछले हफ़्ते इसी क्षेत्र के पाली गांव के रघुवीर यादव ने अपने खेत में जाकर सल्फास खा लिया था और उनकी मौत हो गई थी. उनके पिता देशपत यादव के मुताबिक, उन पर दस लाख रुपये का क़र्ज़ था. लेकिन प्रशासन ने दावा किया कि रघुवीर ने पारिवारिक विवाद के चलते आत्महत्या की. स्थानीय लोगों का कहना है कि रघुवीर कॉन्ट्रैक्ट पर खेती करते थे और कई सालों से लगातार घाटे में चल रहे थे जिस कारण उन पर बहुत क़र्ज़ हो गया था.
पिछले 16 सालों में मध्य प्रदेश में 21,000 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो का कहना है कि इन आत्महत्याओं का कारण फसलों का बर्बाद होना, फसलों का उचित दाम न मिलना, क़र्ज़ न चुका पाना, क़र्ज़ चुकाने के लिए बैंकों और सूदखोरों का दबाव होना और कृषि से जुड़े अन्य कारण हैं.
उत्तर प्रदेश में झांसी के सीपरी बाजार थाना क्षेत्र के करारी गांव में एक किसान सीताराम (48) ने अपने खेत में फांसी लगा ली. 24 जून को उनका शव उनके खेत में एक पेड़ से लटका मिला. परिजनों ने बताया है कि कुछ दिन पहले सीताराम का ट्रैक्टर एक कार से टकरा गया था जिससे कार क्षतिग्रस्त हो गई थी. कार मालिक दंबगई करते हुए 20 हज़ार रुपये मांग रहे थे, लेकिन सीताराम के पास पैसे नहीं थे. दबंगों की धमकी से परेशान सीताराम ने आत्महत्या कर ली.
छत्तीसगढ़ में अंबिकापुर ज़िले के उलकिया गांव में सोमवार रात एक किसान फुलेश्वर पैकरा 40 ने फांसी लगा ली. उन्होंने खेती के लिए आदिम जाति सहकारी समिति से क़र्ज़ ले रखा था. पिछले कुछ दिन से वह क़र्ज़ जमा नहीं कर पाने के कारण मानसिक रूप से परेशान था. हालांकि, पुलिस ने क़र्ज़ के कारण आत्महत्या से इनकार किया है.

मराठवाड़ा में दो हफ़्ते में 42 किसानों ने आत्महत्या की

महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में पिछले दो हफ़्ते में 42 किसानों ने आत्महत्या की है. औरंगाबाद डिवीजनल कमिश्नरेट, जो किसानों की आत्महत्या का लेखा-जोखा रखता है, के हवाले से इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है, ‘इस साल जनवरी से 26 जून तक 445 किसानों ने आत्महत्या की है. एक जून से किसानों के आंदोलन के बाद महाराष्ट्र सरकार ने किसानों की क़र्ज़माफ़ी की घोषणा की थी. इसके बावजूद, महाराष्ट्र के आठ ज़िलों में किसानों ने आत्महत्या की. यहां पिछले दो हफ़्ते में 42 किसानों ने आत्महत्या कर ली. इसकी वजहें कृषि और क़र्ज़ से जुड़ी हैं.’
इस महीने 19 जून से 25 जून के बीच 19 किसानों ने आत्महत्या की. जबकि, 12 जनू से 18 जून के बीच 23 किसानों ने आत्महत्या की.

छत्तीसगढ़ में एक पखवाड़े में 12 किसानों ने दी जान

छत्तीसगढ़ के सरगुजा में 27 जून को एक किसान फुलेश्वर पैकरा ने आत्महत्या कर ली. टाइम्स आॅफ इंडिया के मुताबिक, इसके साथ ही राज्य में एक पखवाड़े में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 11 हो गई है. विपक्षी दल कांग्रेस का कहना है कि राज्य में पिछले दस दिनों में 12 किसानों ने आत्महत्या कर ली है.
किसानों के प्रदर्शन के बाद धमतरी, राजनंदगांव, सरगुजा, दुर्ग, महासमुंद, कांकेर और कवर्धा जिलों में किसानों ने आत्महत्या की है.

पंजाब में भी 8 दिनों में एक दर्जन किसान आत्महत्याएं

किसानों का क़र्ज़ माफ़ करने की पंजाब सरकार की घोषणा के बाद से अब तक पंजाब में एक दर्जन किसानों ने आत्महत्या कर ली है. 19 जून को सरकार ने यह घोषणा की थी. इंडियन एक्सप्रेस अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक, 19 जून से 27 जून के बीच आठ दिनों के भीतर एक दर्जन किसानों ने ख़ुदकुशी कर ली. जितने किसानों ने ख़ुदकुशी की है उन सभी पर तीन से पांच लाख तक संस्थानिक या निजी क़र्ज़ था.
यह आंकड़ा किसान संगठन ने जुटाया है. राज्य में जितने किसानों ने आत्महत्या की है उनमें से चार मानसा ज़िले से हैं. मानसा के जोगा गांव के बूटा सिंह (44) ने 27 जून को अपने खेत में पेस्टिसाइड पी लिया था. उन पर 8.50 लाख का क़र्ज़ था. पंजाब में जून के पहले हफ़्ते में दस किसानों के आत्महत्या करने की ख़बरें आई थीं.

राजस्थान के हाड़ौती संभाग में पांच ख़ुदकुशी

राजस्थान के हाड़ौती संभाग में इस जून में ही पांच किसानों ने आत्महत्या की है. राजस्थान पत्रिका की एक ख़बर में कहा गया है कि ‘हाड़ौती के किसानों के लिए जून 2017 यमराज बनकर आया. अब तक संभाग में पांच किसान आत्महत्या कर चुके हैं.’
इन आत्महत्याओं का कारण गिरता लहसुन का दाम है. ‘मौजूदा भाव में बुवाई का ख़र्च़ भी नहीं निकल रहा जिससे परेशान होकर किसान आत्महत्या कर रहे हैं.
अख़बार ने लिखा है, ‘हाड़ौती में 3 जून को लहसुन के कम भाव मिलने से सदमे में रोण निवासी सत्यनारायण मीणा की मौत हो गई. 21 जून को सकरावदा निवासी संजय मीणा ने क़र्ज़ से परेशान होकर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. 23 जून को सुनेल निवासी बगदीलाल राठौर ने भी क़र्ज़ के चलते ख़ुदकुशी कर ली. 24 जून को डग निवासी शेख़ हनीफ़ ने क़र्ज़ से परेशान होकर आत्महत्या कर ली. 27 जून को कोटा ज़िले के अयाना थाना क्षेत्र के श्रीपुरा निवासी मुरलीधर मीणा (32) ने लहसुन के कम दाम मिलने से आहत होकर जहर खाकर जान दे दी.’

तेलंगाना में भी तबाही

तेलंगाना राज्य बनने के बाद से अब तक वहां पर 3,000 से ज़्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं. इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अलग राज्य बनने के बाद से तेलंगाना में अब तक 3,026 किसानों ने आत्महत्या कर ली है. एक एनजीओ के हवाले से इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 2014 में 792, 2015 में 1147 और 2016 में 784 किसानों ने आत्महत्या की. इस साल जनवरी से जून तक 294 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. दक्षिणी राज्यों में तेलंगाना में भी किसानों की ख़ुदकुशी जारी है. तेलंगाना के खम्मम और भद्राद्री कोठागुडम ज़िलों में ही पिछले तीन महीने में 22 किसानों ने आत्महत्या की है.

क्या है किसानों की मूल समस्या

क़रीब 70 प्रतिशत भारतीय कृषि पर निर्भर हैं. इनमें से 9 करोड़ परिवार सीधे तौर पर किसानी से जुड़े हैं. यह आबादी अपने ज़रूरी ख़र्च से कम आमदनी के कारण क़र्ज़ लेने पर मजबूर होती है. अंतत: क़र्ज़ का बोझ अंतत: उसकी जान ले लेता है.
इंडिया स्पेंड के आंकड़ों के हवाले से हिंदुस्तान टाइम्स अख़बार में छपी एक ख़बर में कहा गया है कि क़रीब 70 प्रतिशत भारतीयों के 90 मिलियन यानी 9 करोड़ परिवार हर महीने अपनी कमाई से ज़्यादा ख़र्च करते हैं, इस कारण उन्हें क़र्ज़ लेना पड़ता है. देश भर में आधे से ज़्यादा किसानों की आत्महत्या का कारण क़र्ज़ ही है.
नेशनल सैंपल सर्वे का डाटा कहता है कि 6 करोड़ से ज्यादा परिवार ऐसे हैं जिनके पास एक एकड़ या उससे कम खेती की ज़मीन है. उनका जितना ख़र्च है उससे कम कमा पाते हैं.
यानी बढ़ती महंगाई, खेती में बढ़ती लागत, कम आमदनी, कृषि उपज का उचित मूल्य न मिलने और इसके फलस्वरूप क़र्ज़ बढ़ने से पूरे देश के मध्यम और सीमांत किसान मुसीबत में हैं. क़र्ज़ चुकाने को लेकर बैंक और सूदखोर इतना दबाव डालते हैं कि किसान पैसे न दे पाने की हालत में आत्महत्या कर रहे हैं.

किसान आत्महत्या के डरावने आंकड़े

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों में कहा गया कि नरेंद्र मोदी के शासन काल में 2014-15 के दौरान किसानों के आत्महत्या करने की दर 42 प्रतिशत बढ़ गई है.
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, पिछले 22 सालों में देश भर में तकरीबन सवा तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं. भारत के कई राज्यों में हज़ारों की संख्या में किसान क़र्ज़, फ़सल की लागत बढ़ने, उचित मूल्य न मिलने, फ़सल में घाटा होने, सिंचाई की सुविधा न होने और फ़सल बर्बाद होने के चलते आत्महत्या कर लेते हैं.
ब्यूरो के मुताबिक, 2015 में कृषि से जुड़े 12,602 किसानों ने आत्महत्या की. 2014 में यह संख्या 12,360 थी. इसके पहले 2013 में 11,772, 2012 में 13,754, 2011 में 14 हजार, 2010 में 15 हजार से अधिक, 2009 में 17 हजार से अधिक किसानों ने कृषि संकट, क़र्ज़, फ़सल ख़राब होने जैसे कारणों के चलते आत्महत्या कर ली.
2016 का आंकड़ा अभी जारी नहीं हुआ है. लेकिन जिस तरह से राज्यों से किसानों द्वारा आत्महत्या करने की ख़बरें आईं, उस आधार पर कहा जा सकता है कि 2016 और 17 के हालात और भयानक हैं.
पिछले कई बरसों महाराष्ट्र में सबसे ज़्यादा किसान आत्महत्या करते हैं. अकेले महाराष्ट्र में 1995 से लेकिन अब तक 60,000 से ज़्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं.
महाराष्ट्र के बाद तेलंगाना दूसरे और कर्नाटक तीसरे नंबर पर है. देश में जितने किसान आत्महत्याएं करते हैं, उनमें से 94 प्रतिशत मात्र छह राज्यों में हैं. ये राज्य हैं- महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, आंध प्रदेश और छत्तीसगढ़.
देश भर में ये सैकड़ों आत्महत्याएं देश के प्रशासन और किसानों को लेकर सरकारों की प्राथमिकता पर गंभीर सवाल खड़ा करती हैं. क्या भारत ऐसा देश बन गया है जहां किसान होना मौत की गारंटी है?
वायर से साभार

कोविन्द, दलित राजनीति और हिन्दू राष्ट्रवाद

रामनाथ कोविन्द को राष्ट्रपति पद का अपना उम्मीदवार घोषित कर, भाजपा ने एक बार फिर प्रतिकात्मक राजनीति का दांव खेला है। कोविन्द केवल नाम के लिए दलित हैं। असल में वे एक खालिस हिन्दू राष्ट्रवादी हैं। मोदी सरकार के पिछले तीन सालों के कार्यकाल में मुसलमानों और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ-साथ दलितों के खिलाफ हिंसा में भी बढ़ोत्तरी हुई है। मद्रास आईआईटी में पेरियार स्टडी सर्किल को प्रतिबंधित किया गया और ऐसी परिस्थितियां निर्मित कर दी गईं कि रोहित वेम्युला नाम के दलित शोधार्थी को आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ा। दलितों के विरूद्ध गुजरात के ऊना में हिंसा हुई। एक समुदाय के तौर पर दलित, हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति के निशाने पर हैं। एक केन्द्रीय मंत्री ने दलितों की तुलना कुत्तों से की और उत्तरप्रदेश भाजपा के उपाध्यक्ष कृपाशंकर सिंह ने कहा कि मायावती एक वेश्या से भी बदतर हैं। पार्टी ने औपचारिक रूप से सिंह को डांट पिलाई परंतु उनकी पत्नी को विधानसभा चुनाव में टिकट दे दिया और अब वे उत्तरप्रदेश की योगी सरकार में मंत्री हैं। योगी के सत्ता में आने के बाद उत्तरप्रदेश के सहारनपुर में भयावह दलित-विरोधी हिंसा हुई। योगी की सरकार बनने के बाद से ऊँची जातियों की हिम्मत बढ़ गई है। चन्द्रशेखर के नेतृत्व वाली भीम आर्मी ने जब दलितों पर हमलों का विरोध किया तो चन्द्रशेखर को गिरफ्तार कर लिया गया जबकि हमलावरों पर केवल मामूली धाराएं लगाकर उन्हें खुले घूमने की इजाज़त दे दी गई।
कोविन्द को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने दलितों के घाव पर मरहम लगाने की सतही कोशिश की है। हमें याद रखना चाहिए कि गुजरात कत्लेआम - जिसे गोधरा अग्निकांड के बहाने अंजाम दिया गया था-के तुरंत बाद मुसलमानों को प्रसन्न करने के लिए भाजपा ने डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम को देश का राष्ट्रपति बनाया था। यह भी एक प्रतीकात्मक कदम था, जिसने समाज में व्याप्त अल्पसंख्यक-विरोधी प्रवृत्तियों पर कोई प्रभाव नहीं डाला। प्रतीकात्मकता का अर्थ ही यह होता है कि उससे आपको केवल यह महसूस होता है कि कोई आपकी ओर मदद का हाथ बढ़ा रहा है, जबकि यथार्थ में ऐसा नहीं होता।
कोविन्द पुराने आरएसएस स्वयंसेवक हैं और उन्होंने अपने पुश्तैनी मकान को संघ की गतिविधियों के लिए अर्पित कर दिया है। उनके विभिन्न वक्तव्यों से यह पता चलता है कि वे इस्लाम और ईसाईयत को विदेशी धर्म मानते हैं। रंगनाथ मिश्र आयोग की रपट पर संसद में चर्चा में इस्लाम और ईसाई धर्म स्वीकार कर चुके दलितों के लिए आरक्षण के मुद्दे पर बहस के दौरान कोविन्द का यह दृष्टिकोण सामने आया था। कोविन्द का यह भी कहना है कि शिक्षा को आरक्षण पर प्राथमिकता मिलनी चाहिए। स्पष्टतः, वे दलितों को आरक्षण दिए जाने के समर्थक नहीं हैं।
भाजपा नेता के रूप में कोविन्द ने उत्तरप्रदेश के गैर-जाटव दलितों को पार्टी की ओर आकर्षित करने के अभियान में भाग लिया था। भाजपा-आरएसएस ने कई दलितों को अपने साथ कर लिया है। इनमें रामविलास पासवान जैसे नेता शामिल हैं, जो सत्ता के लिए दलितों के हितों की बलि चढ़ाने से नहीं चूकते। इन्ही पासवान ने फरमाया कि जो लोग कोविन्द का विरोध कर रहे हैं, वे दलित-विरोधी हैं! दलित नेता होने का क्या अर्थ है? क्या कोविन्द और पासवान जैसे लोग - जो दलितों के खिलाफ बढ़ती हिंसा के बारे में एक शब्द भी नहीं बोलते - दलित नेता कहे जा सकते हैं? इस समय देश का दलित नेतृत्व असमंजस की स्थिति में है। रामविलास पासवाननुमा दलित नेता भाजपा-आरएसएस के साथ जुड़ गए हैं क्योंकि वही सत्ता की उनकी भूख को पूरा कर सकती है। परंतु ऐसी दलित नेताओं की संख्या भी बहुत बड़ी है जो दलितों की गरिमा और उनके अधिकारों के लिए व्यवस्था से संघर्ष कर रहे हैं। वे उन्हें समान नागरिक का दर्जा दिलवाना चाहते हैं। भारतीय संविधान, दलितों के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। उसने सैद्धांतिक तौर पर दलितों को बराबरी का दर्जा दिया। संविधान ने दलितों का वह ज़मीन दी, जिस पर खड़े होकर वे अपने अधिकारों के लिए लड़ सकते हैं।
दूसरी ओर, आरएसएस की राजनीति, भारतीय राष्ट्रवाद की विरोधी है और हिन्दू राष्ट्रवाद की पैरोकार। संघ की आस्था उन धर्मग्रंथों में है, जो जातिगत पदक्रम को औचित्यपूर्ण ठहराते हैं। क्या यह केवल संयोग है कि आरएसएस तब अस्तित्व में आया जब महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में गैर-ब्राह्मण आंदोलन के रूप में दलित अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने को उठ खड़े हुए थे। यह आंदोलन उस सामाजिक ढांचे के खिलाफ था, जो ब्राह्मण ज़मींदारों को जनता का प्रभु बनाता था। समानता के लिए संघर्ष, स्वाधीनता संग्राम के समानांतर चलता रहा। दलितों ने कई आंदोलनों के ज़रिए समानता के लिए संघर्ष किया। हिन्दू राष्ट्रवाद, जातिगत पदक्रम और जाति व्यवस्था के सदियों पुराने ढांचे को बनाए रखने का हामी है। सन 1990 के दशक के बाद से, आरएसएस-भाजपा की राजनीति आरक्षण के विरोध पर आधारित रही है। उसने कई स्तरों पर दलितों को अपना हिस्सा बनाने के लिए काम किया। वनवासी कल्याण आश्रम आदिवासियों के हिन्दुकरण के लिए काम करता आ रहा है। सामाजिक समरसता मंच समानताके विरूद्ध समरसताकी बात करता है। हिन्दू राष्ट्रवादी यह प्रचार करते रहे हैं कि दलितों ने हिन्दू धर्म की इस्लाम के हमले से रक्षा की।
पिछले कुछ समय से अंबेडकर भी संघ परिवार के प्रिय बन गए हैं। उन्हें एक महान हिन्दूबताया जा रहा है और उनकी जयंती पर भव्य कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। सच यह है कि अंबेडकर और आरएसएस की राजनीति एक-दूसरे की धुर विरोधी हैं। अंबेडकर, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के हामी थे; हिन्दू राष्ट्रवाद, वैदिक काल के पदक्रम-आधारित समाज का समर्थक है। सोशल इंजीनियरिंग के ज़रिए दलितों को बाबरी मस्ज़िद के ध्वंस में भागीदार बनाया गया और उन्हें मुसलमानों के खिलाफ सड़कों पर हिंसा करने के लिए प्रेरित किया गया।
                                                   कोविन्द को हम कैसे देखें? यह मानना गलत होगा कि किसी धर्म, जाति या वर्ग में जन्म लेने से ही वह व्यक्ति उस धर्म, जाति या वर्ग के हितों का संरक्षक हो जाता है। देश में ऐसे कई दलित नेता हैं जो हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति के पिछलग्गू हैं और दलितों के हितों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। दूसरी ओर, ऐसे गैर-दलित नेता भी हैं जो अंबेडकर के आदर्शों में सच्चे मन से विश्वास रखते हैं और दलितों के कल्याण के लिए काम करते हैं। कोविन्द ने निश्चित तौर पर आरएसएस की वह शपथ ली होगी, जो हिन्दू राष्ट्र के निर्माण की बात कहती है। भारतीय राष्ट्रवादियों के लिए भारत का संविधान सबसे पवित्र पुस्तक है। अगर कोविन्द राष्ट्रपति बनते हैं तो वे हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के लिए काम करेंगे या भारतीय संविधान की रक्षा के लिए?
 -राम पुनियानी





मंगलवार, 13 जून 2017

लोकसंघर्ष पत्रिका के जून 2017अंक का मुख्य कवर

लोकसंघर्ष पत्रिका के जून 2017अंक का मुख्य कवर

लोकसंघर्ष पत्रिका के जून 2017अंक में श्री एस आर दारा पुरी का साक्षात्कार

लोकसंघर्ष पत्रिका के जून 2017अंक में स्वतंत्रता सेनानी पूरन चन्द्र जोशी के संबंध में
लोकसंघर्ष पत्रिका के जून 2017अंक में स्वतंत्रता सेनानी पूरन चन्द्र जोशी के संबंध में

अंग्रेजों के द्वारा किए गए शोषण के संबंध में रजनी पाम दत्त के विचार लोकसंघर्ष पत्रिका जून 2017मे


बुधवार, 7 जून 2017

ये कोरस लोकतंत्र की हत्या का बैकग्राउंड म्यूज़िक है

डर के दस्तावेज़ नहीं होते हैं, डर का माहौल होता है. मेरा यही छोटा सा जवाब होता है जब कोई कहता है कि देश में इमरजेंसी नहीं है, इमरजेंसी का भ्रम फैलाया जा रहा है. सत्ता के आतंक और अंकुश का अंतिम पैमाना आपातकाल नहीं है. डराने के और भी सौ तरीके आ गए हैं, जो आपातकाल के वक्त नहीं थे.
सरकारें सबको नहीं डराती हैं, सिर्फ उन्हें डराती है, जिनसे उसे डर लगता है. ऐसे ही लोगों के आस-पास डर का माहौल रचा जाता है. यही वो माहौल है जहां से सत्ता आपको डराती है.
यूनिवर्सिटी में इंटरनेट कनेक्शन काट दिया जाता है. पटेल आंदोलन होता है तो इंटरनेट बंद कर दिया जाता है. दलित आंदोलन होता है तो इंटरनेट बंद हो जाता है. मध्य प्रदेश के मंदसौर में इंटरनेट बंद करने का क्या तुक रहा होगा? क्या मंदसौर में मॉस्को जितनी इंटरनेट कनेक्टिविटी होगी?
रवीश कुमार

'डर का दस्तावेज़ फाइलों में नहीं मिलेगा'

गोली खाने वाले किसानों की 'डिजिटल और डेटा हिस्ट्री' चेक की जाएगी?
सरकार को जब जनता से डर लगता है, तब उसका विश्वास इंटरनेट से उठ जाता है लेकिन जब बर्मा और बांग्लादेश की फर्ज़ी तस्वीरों को लेकर सांप्रदायिक उन्माद फैलाया जाता है, तब इंटरनेट बंद नहीं किया जाता है.
यही वो उन्माद है जो हमारे समय में डर का दस्तावेज़ है. जो फाइलों में नहीं मिलेगा, माहौल में मिलेगा.
फ़ोन पर गालियां देने वाला ख़ुद को कोलकाता का बता रहा था, कह रहा था कि तुम सुधर जाओ जबकि मैं छह जून को किसानों की आमदनी पर चर्चा करके स्टूडियो से निकला था.
किसानों को सच बताना गलत है?क्या किसानों को यह बताना ग़लत है कि आपकी मासिक आमदनी 1600 रुपये है. सरकार ने लागत में पचास फीसदी जोड़कर दाम देने का अपना वादा पूरा नहीं किया है.
क्या किसानों की बात करने पर गालियां दी जाएंगी? बहरहाल, जिस तरह की गाली दी गई, उसे मैं भारतीय संस्कृति का दुर्लभ दस्तावेज़ मानता हूं, इन सबको संकलित कर संसद के पटल पर रखा जाना चाहिए.
किसान
जब से एनडीटीवी के प्रमोटर के यहां सीबीआई ने छापे मारे हैं, तब से ऐसे फोन की तादाद बढ़ गई है. एनडीटीवी को लेकर पहले से झूठ की सामग्री तैयार रहती है, उसी का वितरण समय-समय पर चालू हो जाता है. फोन पर कोई मुझे माओवादी कहता है, कोई अलगाववादी.
कोई देख लेने की धमकियां दे रहा है, व्हाट्सऐप के ज़रिए लगातार अफ़वाह फैलाई जा रही है कि मैं माओवाद का समर्थन करता हूं. अहमदाबाद एयरपोर्ट पर ख़ुद को बीजेपी का समर्थक बताने वाले एक सज्जन को नहीं समझा सका कि मैं माओवाद का समर्थन नहीं करता हूं.
'मेरे जैसे लोग सड़क पर घेर कर मार दिए जाएंगे'व्हाट्सऐप के ज़रिए फैलाए जाने वाला झूठ एक दिन लोगों के मन में रेफरेंस प्वाइंट बन जाता है. वो उसी चश्मे से देखने लगते हैं. जिस दिन बहुत से लोग इस झूठ पर यक़ीन कर लेंगे, मेरे जैसे लोग सड़क पर घेर कर मार दिए जाएंगे.
उनकी हत्या का आदेश गृह मंत्रालय की फाइल में नहीं मिलेगा. माहौल में मिलेगा जिसे राजनैतिक तौर पर रचा जा रहा है.
अफ़वाह भारत का नया राजनीतिक उद्योग है. राजनीतिक दल का कार्यकर्ता अब इस अफवाह को फैलाने वाला वेंडर बन गया है. सिर्फ दो सवाल कीजिए, आपको सारे जवाब मिल जाएंगे. ये लोग कौन हैं और कौन लोग इनके समर्थन में हैं.
'मोदी का ट्विटर हैंडल सब बता देगा'इसके लिए आपको बार-बार प्रधानमंत्री मोदी के ट्विटर हैंडल पर जाकर चेक करने की ज़रूरत नहीं है, बहुत से गायक, लेखक, समाजसेवी बनकर घूम रहे लोगों की टाइमलाइन से भी आप इसकी पुष्टि कर सकते हैं.
ये वही लोग हैं जो किसानों और ग़रीबों की बात करने पर किसी को नक्सल घोषित कर रहे हैं. तभी तो मुख्यमंत्री कह पाते हैं कि किसान पुलिस की गोली से नहीं मरे, असामाजिक तत्वों की गोली से मरे हैं. एक और मुख्यमंत्री हैं जो कहते हैं कि जो लोग किसानों को आंदोलन के लिए भड़का रहे हैं वो पाप कर रहे हैं.
देश भर में अनेक जगहों पर किसान आंदोलन कर रहे होते हैं, एक दिन सोशल मीडिया पर उनके ख़िलाफ़ भी अभियान चलेगा कि ये किसान नहीं, पापी हैं.
आजकल कई पत्रकारों को विपक्ष के किसी नेता के ख़िलाफ़ कोई स्टोरी दे दीजिए, फिर देखिए उनके चेहरे पर कैसी आध्यात्मिक खुशी छा जाती है. आप इन्हीं पत्रकारों को केंद्र के ख़िलाफ़ या सत्ताधारियों के ख़िलाफ़ कोई स्टोरी दे दीजिए, फिर उनकी चुप्पी देखिए.
पत्रकार का काम होता है सरकार के दावों पर पहले संदेह करे, जांच करे. इन दिनों सरकार की बात पर यकीन करने वाले पत्रकारों का समूह बढ़ गया है. इन पत्रकारों के पास सबसे बड़ा तर्क यह है कि पहले भी तो होता था.
मोदी

'वो एक दिन स्टूडियो में ही गोली चला देंगे' 

भारतीय पत्रकारिता में सरकार परस्ती बढ़ गई है. सरकार से प्यार करने वाले पत्रकारों की आपूर्ति मांग से ज़्यादा है इसलिए अब पत्रकार हुकूमत की नज़र में आने के लिए कुछ भी कर सकते हैं.

यही कारण है कि ऐसे पत्रकारों में होड़ मची है कैसे हुकूमत की नज़र में आ सकें. चीख कर, चिल्ला कर, धमका कर या उकसा कर. वो एक दिन स्टूडियो में ही गोली चला देंगे.
जिन दोस्तों से बात करता हूं वो हर दूसरी बात के बाद यही कहते हैं कि फोन तो रिकॉर्ड नहीं हो रहा है. मेरे पास इसका कोई प्रमाण नहीं है मगर माहौल में यह बात है कि फोन रिकॉर्ड हो रहा है.
चुप रहने की सलाह बढ़ती जा रही है. जानता हूं भीड़ कुछ भी कर सकती है. यह भीड़ गौमांस के नाम पर किसी मुसलमान को मार सकती है, यह भीड़ बच्चा चोरी की अफवाह पर किसी हिन्दू को मार सकती है, यही भीड़ लंगर के लिए अनाज मांग रहे किसी सिख सेवादार की पगड़ी उछाल सकती है.

'यह भीड़ नहीं, राजनीति का नया रॉकेट है'

यूपी में जब पुलिस अधिकारी नहीं बचे तो मैं सुरक्षा किससे मांगू. कहीं ऐसा न हो जाए कि यूपी का एसएसपी बजरंग दल के नेताओं की सुरक्षा में ड्यूटी पर जा रहा हो.
यह भीड़ नहीं, राजनीति का नया रॉकेट है जिसका हर दिन प्रक्षेपण किया जाता है. सतर्क रहने की चेतावनी जब बढ़ जाए तो इसका मतलब है कि डर का सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक वितरण व्यापक हो चुका है.
डर का माहौल हर जगह नहीं होता है. उन्हीं के आसपास होता है जो सामाजिक आर्थिक मसलों पर बोलते हैं. यह व्यक्ति भी हो सकता है और समूह भी. दो रोज़ पहले पुरानी दिल्ली के किनारी बाज़ार से एक फोन आया था. कहने लगे कि हम व्यापारी हैं, अब हम खुलकर तो नहीं बोल सकते वरना ये सेल्स टैक्स और सीबीआई लगा देंगे, सोशल मीडिया से गाली दिलवा देंगे.
अच्छा है कि भाई साहब आप खुलकर बोलते हो. कोई तो बोल रहा है.
'फोन से डर की आवाज़ आ रही थी'
मैं हर विषय पर नहीं बोलता हूं. बोलने की पात्रता भी नहीं रखता. मेरी इस सफाई से किनारी बाज़ार के व्यापारी को कोई फर्क नहीं पड़ा. उनकी आवाज़ में डर था. मेरा हौसला बढ़ाने के लिए किया गए फोन से डर की आवाज़ आ रही थी.
ठीक इसी समय में बहुत से पत्रकार बोल रहे हैं. लिख रहे हैं मगर उनकी खबरों की पहुंच लगातार सीमित होती जा रही है. वो सब अपने-अपने संस्थान और मोहल्ले में अकेले हैं. जो हुकूमत के सुर से सुर मिलाकर गीत गा रहे हैं, उनकी आवाज़ ज़्यादा है. आप इस कोरस को ग़ौर से सुनियेगा. इस कोरस से जो संगीत निकल रहा है, वो भय का संगीत है.

लोकतंत्र की हत्या से पहले का बैकग्राउंड म्यूज़िक है.

भारत का मीडिया डर की राजधानी में रहता है. हम सब उस राजधानी से रोज़ गुज़रते हैं. डर सीबीआई का नहीं है, उस भीड़ का है जो थाने के बाहर भी है, अदालत के परिसर में भी. इस भीड़ को लेकर जो लोग नरम हैं, वही तो डर के दस्तावेज़ हैं.
वैसे लोग फाइलों में नहीं मिलते, आपके पड़ोस में हैं.
 

रविवार, 28 मई 2017

सीमा पर जवान सरकार की नीतियो के कारण शहीद हो रहे है-डा0 गिरीश

बाराबंकी। फतेहपुर कस्बें में आयोजित भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के तीन दिवसीय शिक्षा अध्ययन शिविर के तीसरे दिन कार्यकर्ताओ को सम्बोधित करते हुये प्रदेश सचिव डा0 गिरीश शर्मा ने कहा कि सीमा पर जवानो को सरकार की नीतियो के कारण लोग शहीद हो रहे है। और सत्तारुढ़ दल उनकी शहादत पर राजनीति कर वोट बैंक को बढ़ाने का काम कर रही है।
                                        अध्ययन शिविर को सम्बोधित करते हुये गोण्ड़ा के वरिष्ठ अधिवक्ता सुरेश त्रिपाठी ने कहा कि कार्यकर्ताओ को नित्य अपने कार्यक्रम निश्चित करना चाहिए। और प्रतिदिन उसकी समीक्षा करनी चाहिए और समय का सद्उपयोग करना चाहिए। अध्ययनशील होकर जनपक्षीय साहित्य का प्रचार-प्रसार करना चाहिए। भौतिकवादी चिन्तन धारा के महापुरुषो की कृतियो की जैसे राहुल सांकृत्यायन, मुंशी प्रेमचन्द, डा0 अम्बेड़कर आदि का अध्ययन कर प्रचारित करना चाहिए। भारतीय संविधान की मूल धाराओ की रक्षा करने के लिए पढ़े-लिखे चिन्तनशील व्यक्तियो को व प्रमुख रुप से अधिवक्ताओ का आगे आना चाहिए। 
                                  पार्टी के केन्द्रीय शिक्षा विभाग अध्यक्ष अनिल राजिमवाले ने शिविर को सम्बोधित करते हुये कहा कि साथियो को वैचारिक प्रशिक्षण के लिए आज ज्यादा महत्व का हो गया है। क्योकि शासक पार्टी द्वारा बहुत बड़ा वैचारिक आक्रमण किया जा रहा है। देश के इतिहास संस्कृति, राष्ट्रभाषा की अलग-अलग परिभाषा बताई जा रही है। अर्थव्यवस्था और जनतन्त्र इन दोनो पर खतरा है। इसलिए हमारा प्रशिक्षण शिविर इसका जवाब देने मे सक्षम बनाएंगा। 
                                     पार्टी के जिला सचिव बृज मोहन वर्मा ने सभी शिक्षार्थियो को जनपद आने के लिए धन्यवाद किया। वही पार्टी सहसचिव रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि संघ की जहरीली विचारधारा को समाप्त करने के लिए जनपद के विभिन्न जगहो में आयोजित किये जायेगें। 
                                        शिविर मे पुष्पेन्द्र सिंह, विनय कुमार, गिरीश चन्द्र, रामनरेश, अधिवक्ता सरदार भूपिन्दर पाल सिंह, अमर सिंह, विजय प्रताप सिंह, प्रवीन कुमार निर्मल वर्मा, अमर सिंह प्रधान, आनन्द प्रताप सिंह, राजेन्द्र सिंह राणा, कर्मवीर सिंह, नीरज वर्मा मौजूद रहे।